कार्य करना सरकार का काम ,कार्य की मांग करना संगठनों का काम,कानून के दायरे में रहकर उचित मांगे रखने का काम आम शिक्षा मित्र का है,,,,,,
सभी लोग सरकार से ऑर्डिनेंस लाकर समायोजन बचाने को लेकर नया कानून बनाने की मांग कर रहे हैं,यहां एक बात विचारणीय है अद्द्यादेश लाया जा सकता है सरकार अद्द्यादेश लाती भी है साथ ही कूपर केस (1970) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि अध्यादेश की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। हालांकि 38वें संविधान संशोधन अधिनियम 1975 में कहा गया कि राश्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम व मान्य होगी और न्यायिक समीक्षा से परे होगी। परंतु 44वें संविधान संशोधन द्वारा इस उपबंध को खत्म कर दिया गया और अब राष्ट्रपति की संतुष्टि को असद्भाव के आधार पर न्यायिक चुनौती दी जा सकती है।यहां यह मामला संविधान के मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा है अर्थार्त अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों के गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन करेगी या यूं कहें कि अधिकार समाप्त करेगी तथा साथ ही साथ अनुच्छेद 14 व 16 के तहत उन लोगों के मौलिक अधिकारों का भी हनन होगा जो निर्धारित योग्यता रखते हैं व नौकरी पाने के इंतजार में हैं। और ऐसे व्यक्तियो द्वारा अद्द्यादेश को न्यायलय में चुनौती दी जा सकती है।25 जुलाई के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने लिखा है *पौने दो लाख शिक्षा मित्रों के भविष्य का ध्यान, उनके कानूनी हक से ऊपर जाकर, कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत 6 से 14 बर्ष के बच्चों के योग्य शिक्षकों से मुफ्त व गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा लेने के मौलिक अधिकार को दरकिनार कर नही किया जा सकता है,
संसद भारतीय संविधान के मूलभूत ढांचे से छेड़छाड़ करने की शक्ति नही रखती है।प्रत्येक जारी किया हुआ अध्यादेश संसद के दोनो सदनो द्वारा उनके सत्र शुरु होने के 6 हफ्ते के भीतर स्वीकृत करवाना होगा इस प्रकार कोई अध्यादेश संसद की स्वीकृति के बिना 6 मास + 6 सप्ताह से अधिक नही चल सकता है
लोकसभा एक अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला प्रस्ताव 6 सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व पास कर सकती है
अगर अद्द्यादेश न्यायलय द्वारा रद्द होता है तो हम सबके लिए अंतिम चुनौतियो से लड़ना भी अंतिम हो जाएगा।
सरकार के पास जॉब बचाने के कई विकल्प हैं हालांकि सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ का उमा देवी केस शिक्षा मित्रों पर लागू कर चुकी है अर्थार्त नियमतिकरण का कोई विकल्प नही हैं। कानून के दायरे में रहकर ओर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखकर अपनी मांगे रखनी होंगी, जैसे प्रीवियस पद पर भेजते हुए रिजवी कमेटी की शिफारिशें लागू करके समान वेतन देने, उर्दू टेट की तरह टेट कराने, उसके बाद 2 फ्रेश रिक्रूटमेंट में अधिकतम वेटज देने,किसी अन्य प्री प्राइमरी पद सृजित करके सीधी भर्ती में अधिकतम वेटज देने के कई ऑप्शन सरकार के पास हैं जिससे सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी आड़े नही आएगा,ओर उमा देवी जजमेंट भी इफेक्टेड नही करेगा।(मेरे खुद के विकल्प सर्वोच्च न्यायालय का जजमेंट ध्यान में रखते हुए)
हम लोग सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरोध में प्रदर्शन नही कर सकते लेकिन अपनी सभी सटीक मांगे सरकार के समक्ष रखने के लिए अनिश्चित धरना प्रदर्शन लखनऊ में तब तक करना होगा जब तक सरकार कोई ठोस कदम नही उठाती
29/07/2017
SHIKSHAMITRA LEADER FACEBOOK POST
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ReplyDeleteAgar sarkaar adhyadesh laati hai to yah is desh ki sabse badi bidambana hogi..
BHAI ADHYADESH DWARA HUM AYOGYA KO NAUKARI TO DE SAKTE HAIN LEKIN USE ADHYADESH SE YOGYA NAHI BANA SAKTE...
AGAR SARKAAR ADHYADESH LATI HAI TO UN GAREEB BACHCHO KE SAATH ANYAAY KAREGI JO PAISE KE ABHAV ME ACHCHE SCHOOL ME NAHI PADH SAKTE..KYA YAH US BHAVI PEEDHI SE VISWAASGHAT NAHI HOGA JO ACHCHI AUR SASTI SHIKSHA KI AAS ME PRIMARY SCHOOL ME PADHNE AATE HAIN...KYA YAH BHAARAT KE SAMVIDHAAN KE VIRUDDH NAHI HOGA KI UNHE ACHCHI AUR GUNVATTA PURN SHIKSHA PRAPT KARNE KA ADHIKAAR HAI??KYA HUM UNKE SAATH NYAAY KARENGE JO "AVSAR KI SAMANTA" JAISE SAMBIDHAAN KE ARTICLES PAR VISWAS RAKHTE HAIN......
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ReplyDeleteSm ki niukti gram sabha astar se hi galat dhang se Hui thi ye sab 6 se 14 year ke bachho ka futchar ab tak bahut barbad kar liya ab aur nahi
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