28/07/2017

UP TEACHERS राजकीय कॉलेजों में अध्यापकों के समायोजन शासनादेश पर रोक







29 जून 2017 को जारी हुआ था शासनादेश, कोर्ट ने मांगा सरकार और महकमे से जवाब

विधि संवाददाता, इलाहाबाद : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजकीय हाईस्कूल व इंटरमीडिएट कालेजों में अध्यापकों के समायोजन के शासनादेश 29 जून 2017 के अमल पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस संबंध में बेहतर जानकारी देने का निर्देश दिया है। याचिका की अगली सुनवाई आठ अगस्त को होगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल ने शैलेंद्र कुमार सिंह व 107 अन्य अध्यापकों की याचिका पर दिया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग प्रदेश भर के 638 अध्यापकों का समायोजन कर रहा है। याचिका में माध्यमिक शिक्षा निदेशक के 16 जून 2017 के परिपत्र व 29 जून 2017 के शासनादेश की वैधता को चुनौती दी गई है। जिसके तहत निदेशक ने सभी मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशकों व जिला विद्यालय निरीक्षकों को यह निर्देश जारी किए थे कि वह सभी राजकीय माध्यमिक कालेजों में कार्यरत अतिरिक्त शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएं। इसके बाद 29 जून के शासनादेश से ऐसे अतिरिक्त अध्यापकों को, जो राजकीय माध्यमिक कालेजों में कार्यरत हैं उन्हें समायोजित करने का आदेश जारी किया गया है। याची की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे का तर्क है कि परिपत्र और शासनादेश दोनों ही अवैधानिक हैं और अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 के उपबंधों के विपरीत हैं। जिसमें कि अध्यापकों की तैनाती का अनुपात निर्धारित किया गया है।

अनिवार्य शिक्षा कानून में यह व्यवस्था दी गई है कि प्रत्येक कक्षा में विज्ञान, गणित और भाषा के लिए कम से कम एक अध्यापक होना अनिवार्य है। साथ ही 35 छात्रों पर एक न्यूनतम एक अध्यापक रखे जाने की व्यवस्था दी गई है। राज्य सरकार ने जो दिशा निर्देश जारी किए हैं उसके तहत कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए इंटर कालेज के प्रवक्ताओं की तैनाती की गई है, जबकि इन छात्रों को पढ़ाने के लिए टीईटी पास होना अनिवार्य है।

इन छात्रों को पढ़ा रहे अध्यापकों के पास यह योग्यता नहीं है। सरकार ने जो भी दिशा निर्देश जारी किए हैं वह केवल सहायक अध्यापकों पर ही लागू होती है, जो प्रवक्ताओं को प्रभावित नहीं करती। अधिनियम के इस उपबंध के बावजूद राज्य सरकार ने जूनियर हाईस्कूल के छात्रों को पढ़ा रहे प्रवक्ताओं का भी समायोजन करने का आदेश जारी किया है वह अनिवार्य शिक्षा कानून के विपरीत है। खरे का यह भी कहना है कि 29 जून 2017 को जो शासनादेश जारी किया गया है वह पुराने शासनादेश 20 नवंबर 1976 और 1999 में जारी निदेशक के परिपत्र पर आधारित है। कहा कि यह शासनादेश व परिपत्र अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 लागू होने के पहले के हैं ऐसे में सरकार उन्हें आधार नहीं बना सकती। इससे पहले कोर्ट ने राज्य सरकार से याचिका में उठाए गए मुद्दों पर जानकारी मांगी थी। 25 जुलाई 2017 को माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने न्यायालय को जो जानकारी उपलब्ध कराई उससे स्पष्ट हो रहा है कि अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 के उपबंधों पर बिना विचार किए ही परिपत्र व शासनादेश जारी किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य शिक्षा कानून को पूरे देश में बाध्यकारी घोषित किया है। कोर्ट ने याचिका में उठाए गए मुद्दों को विचारणीय मानते हुए राज्य सरकार से बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है और शासनादेश पर रोक लगा दी है।

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