राज्य ब्यूरो, इलाहाबाद
उप्र लोकसेवा आयोग की सीबीआइ जांच की मांग यूं ही नहीं होती रही है, बल्कि पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव के कार्यकाल में एक के बाद एक विवादित प्रस्ताव आते रहे जिसका प्रतियोगियों ने जमकर विरोध किया लेकिन, उस समय की व्यवस्था अब तक लागू है। अब आयोग की विस्तृत जांच होने पर इन प्रस्तावों को लाने के कारणों से पर्दा उठने की उम्मीद है।
आयोग का पहला विवादित प्रस्ताव तत्कालीन सचिव अनिल यादव त्रिस्तरीय आरक्षण का लाए। इसके अनुमोदक गुरदर्शन सिंह रहे, छह जुलाई 2013 को लाये गए इस प्रस्ताव में निर्णय लिया गया था कि परीक्षा के तीनों चरणों मे बार-बार आरक्षण का लाभ अभ्यर्थियों को दिया जाएगा, यह प्रस्ताव उप्र आरक्षण नियमावली 1994 का खुला उल्लंघन था, इस प्रस्ताव को पीसीएस 2011 की मुख्य परीक्षा के परिणाम में लागू किया गया, किंतु यह उजागर होने पर अभ्यर्थियों ने जमकर बवाल किया तथा मामला कोर्ट तक पहुंचा। सपा सरकार के हस्तक्षेप के बाद प्रस्ताव वापस हुआ, तब मुख्य परीक्षा में सफल 178 ओबीसी छात्रों को बाहर कर 151 सामान्य छात्रों को मुख्य परीक्षा में सफल घोषित किया गया, हालांकि उन 151 सफल छात्रों में किसी का चयन अंतिम रूप से नहीं हो सका। इससे साक्षात्कार बोर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हुए। दूसरा प्रस्ताव आठ अक्टूबर 2013 को लाया गया जिसमें अंतिम परिणाम के समय सफल अभ्यर्थियों के नाम के आगे जाति/वर्ग का उल्लेख न करने का अनुमोदन हुआ, यह प्रस्ताव भी उप्र आरक्षण नियमावली 1994 का उल्लंघन था। कार्यकारी सचिव रिजवानुर्रहमान के कार्यकाल में पीसीएस 2014 की प्रारंभिक परीक्षा के गलत उत्तरों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, किंतु कोर्ट को गुमराह करने व आयोग को बचाने के लिए 24 अगस्त, 2014 को एक प्रस्ताव लाया गया और उस प्रस्ताव की गोपनीय पत्र के माध्यम से कोर्ट को दिखाकर पीसीएस 2014 की याचिका खारिज करा दी गई।
उस प्रस्ताव में यह उल्लेख था कि स्क्रीनिंग परीक्षा होने के बाद आयोग उत्तरकुंजी जारी करेगा, छात्रों से आपत्ति लेगा, आपत्ति का निस्तारण करने के बाद परिणाम जारी करने के दिन संशोधित उत्तरकुंजी जारी होगी, किंतु इस प्रस्ताव पर आयोग ने कभी कार्य नहीं किया, जब यह मामला प्रतियोगियों के हाथ लगा तो पीसीएस 2015 के परिणाम आने के बाद इसे कोर्ट के आदेश से लागू कराया, यह मामला अब भी न्यायालय में लंबित है। सचिव रिजवानुर्रहमान के समय 22 अप्रैल, 2015 को प्रस्ताव लाया गया।’
>>भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए उप्र लोकसेवा आयोग ने बदले नियम
’>> सीबीआइ जांच में यह प्रकरण भी होगा उजागर
उप्र लोकसेवा आयोग की सीबीआइ जांच की मांग यूं ही नहीं होती रही है, बल्कि पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव के कार्यकाल में एक के बाद एक विवादित प्रस्ताव आते रहे जिसका प्रतियोगियों ने जमकर विरोध किया लेकिन, उस समय की व्यवस्था अब तक लागू है। अब आयोग की विस्तृत जांच होने पर इन प्रस्तावों को लाने के कारणों से पर्दा उठने की उम्मीद है।
आयोग का पहला विवादित प्रस्ताव तत्कालीन सचिव अनिल यादव त्रिस्तरीय आरक्षण का लाए। इसके अनुमोदक गुरदर्शन सिंह रहे, छह जुलाई 2013 को लाये गए इस प्रस्ताव में निर्णय लिया गया था कि परीक्षा के तीनों चरणों मे बार-बार आरक्षण का लाभ अभ्यर्थियों को दिया जाएगा, यह प्रस्ताव उप्र आरक्षण नियमावली 1994 का खुला उल्लंघन था, इस प्रस्ताव को पीसीएस 2011 की मुख्य परीक्षा के परिणाम में लागू किया गया, किंतु यह उजागर होने पर अभ्यर्थियों ने जमकर बवाल किया तथा मामला कोर्ट तक पहुंचा। सपा सरकार के हस्तक्षेप के बाद प्रस्ताव वापस हुआ, तब मुख्य परीक्षा में सफल 178 ओबीसी छात्रों को बाहर कर 151 सामान्य छात्रों को मुख्य परीक्षा में सफल घोषित किया गया, हालांकि उन 151 सफल छात्रों में किसी का चयन अंतिम रूप से नहीं हो सका। इससे साक्षात्कार बोर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हुए। दूसरा प्रस्ताव आठ अक्टूबर 2013 को लाया गया जिसमें अंतिम परिणाम के समय सफल अभ्यर्थियों के नाम के आगे जाति/वर्ग का उल्लेख न करने का अनुमोदन हुआ, यह प्रस्ताव भी उप्र आरक्षण नियमावली 1994 का उल्लंघन था। कार्यकारी सचिव रिजवानुर्रहमान के कार्यकाल में पीसीएस 2014 की प्रारंभिक परीक्षा के गलत उत्तरों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, किंतु कोर्ट को गुमराह करने व आयोग को बचाने के लिए 24 अगस्त, 2014 को एक प्रस्ताव लाया गया और उस प्रस्ताव की गोपनीय पत्र के माध्यम से कोर्ट को दिखाकर पीसीएस 2014 की याचिका खारिज करा दी गई।
उस प्रस्ताव में यह उल्लेख था कि स्क्रीनिंग परीक्षा होने के बाद आयोग उत्तरकुंजी जारी करेगा, छात्रों से आपत्ति लेगा, आपत्ति का निस्तारण करने के बाद परिणाम जारी करने के दिन संशोधित उत्तरकुंजी जारी होगी, किंतु इस प्रस्ताव पर आयोग ने कभी कार्य नहीं किया, जब यह मामला प्रतियोगियों के हाथ लगा तो पीसीएस 2015 के परिणाम आने के बाद इसे कोर्ट के आदेश से लागू कराया, यह मामला अब भी न्यायालय में लंबित है। सचिव रिजवानुर्रहमान के समय 22 अप्रैल, 2015 को प्रस्ताव लाया गया।’
>>भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए उप्र लोकसेवा आयोग ने बदले नियम
’>> सीबीआइ जांच में यह प्रकरण भी होगा उजागर

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